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Kabir Das Jayanti jivan parichay Hindi 2023: कबीर दास जी का जन्म संवत् 1455 की ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था। इसीलिए ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा के दिन देश भर में Kabir Das Jayanti मनाई जाती है। संत कबीर दास जी समाज में फैले आडम्बरों के सख्त विरोधी थे। उन्होंने लोगों को एकता के सूत्र का पाठ पढ़ाया। वे लेखक और कवि थे। उनके दोहे इंसान को जीवन की नई प्रेरणा देते थे।
उन्होंने विधिवत शिक्षा नहीं ग्रहण की थी, इसके बावजूद वे दिव्य प्रभाव के धनी थे। कबीरदास जी को हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही संप्रदायों में बराबर का सम्मान प्राप्त था।कबीर ने जिस भाषा में लिखा, वह लोक प्रचलित तथा सरल भाषा थी। दोनों संप्रदाय के लोग उनके अनुयायी थे। यही कारण था कि उनकी मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था।
Kabir Das के जन्म को लेकर हैं दो मत
Kabir Das Jayanti in Hindi 2023: कुछ लोग उन्हें हिन्दू मानते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि उनका जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके जन्म को लेकर ऐसा भी वर्णन है कि वे रामानंद स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक ब्राह्मणी के गर्भ से जन्मे थे, जो एक विधवा थी।
कबीरदास जी की मां को भूल से रामानंद स्वामी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। वहीं एक अन्य मतानुसार यह भी कहा जाता है कि कबीर जन्म से ही मुसलमान थे और बाद में उन्हें अपने गुरु रामानंद से हिन्दू धर्म का ज्ञान प्राप्त हुआ। कबीरदास जी देशाटन करते थे और सदैव साधु-संतों की संगति में रहते थे।
शुक्रवार को ज्येष्ठ पूर्णिमा है और कबीर जयंती भी इसी दिन है। इस अवसर पर शहर के विद्वानों ने कबीर के कृतित्व और व्यक्तित्व पर बात करते हुए उन्हें प्रासंगिक बताया। इतिहासविद पद्मश्री योगेश प्रवीन ने कहा कि कबीर हर दौर में समतावादी रहे।
वह पाखंड के विरोधी थे।हिन्दू-मुस्लिम हर किसी को गलत बातों के लिए उन्होंने फटकार लगायी। उनका मानना था कि जीवन में जीने की उमंग रहे, और व्यक्ति से कोई गलत काम न हो। कबीर दास समाज को रूढ़ियों और सामाजिक भेदभाव की बेड़ियों से मुक्त कराना चाहते थे।
वरिष्ठ व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी कहते हैं कि कबीर हर समय प्रासंगिक रहे हैं और रहेंगे। उन्होंने जो जीवन मूल्य हमें सिखाए, वे भारत के शाश्वत मूल्य हैं। उनमें आस्था और विश्वास है। उन्हें हिन्दी व्यंग्य का पहला व्यंग्कार माना जाता है। उनके जैसी विभूतियां कम हैं, जिनके हर धर्म में अनुयायी हैं। उनके पद घर-घर में सुने जाते हैं।
नवाब आसफुद्दौला ने बनवाया कबीर मंदिर
पद्मश्री योगेश प्रवीन ने बताया कि नवाबी दौर में संतो का काफी सम्मान होता था। खदरा में बना कबीर मंदिर इसकी बानगी है। इसे नवाब आसफुद्दौला ने बनवाया था। कबीर इंसानियत और मोहब्बत के पैरोकार थे। उन्होंने हमेशा एकता और भाईचारे की बात की।
कबीर दास के दोहे 2023

1. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का।
2. धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।
मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा !
3. तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !
4. लूट सके तो लूट ले,राम नाम की लूट । पाछे फिर पछ्ताओगे,प्राण जाहि जब छूट ॥
कहते हैं कि अभी राम नाम की लूट मची है , अभी तुम भगवान् का जितना नाम लेना चाहो ले लो नहीं तो समय निकल जाने पर, अर्थात मर जाने के बाद पछताओगे कि मैंने तब राम भगवान् की पूजा क्यों नहीं की ।
5. काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । पल में प्रलय होएगी,बहुरि करेगा कब ॥
समय की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और और जोआज करना है उसे अभी करो , कुछ ही समय में जीवन ख़त्म हो जायेगा फिर तुम क्या कर पाओगे !